जनेऊँ क्रांति परिचय

Paramdham|Janeu Kranti
चन्द्रमोहन (क्रांतिगुरु)

श्री परमधाम, अरिहंतपुरम, वलीदपुर दौराला, मेरठ, उत्तर प्रदेश

ऊँ- अध्यात्म पूजा -क्रांतिकारियों की शक्ति यह है -


1. प्रकृति से प्रेम करना। 
2. ज्ञान को धारण करना व अन्दर की पूजा करना। 
3. पंचदेवों व असहायों की सेवा करना। 

1. प्रकृति से प्रेम करना (पेड़-पोधों व जल स्रोत का सत्कार करना। वृक्ष को शंकर व जल स्रोत को विष्णु मानना और वायुमण्डल को ब्रह्मा मानना) - 
हमें हृदय से प्रकृति से प्रेम करना चाहिए क्योंकि प्रकृति अमृत प्राप्त करने में हमारी मदद करती है। इसलिये वनस्पति (पेड़, पौधे इत्यादि) को शंकर कहा गया, जल स्त्रोत को विष्णु कहा गया और वायुमण्डल को ब्रह्मा कहा गया। शंकर और विष्णु अर्थात वनस्पति और पीने के जल स्त्रोत के प्रति सम्मान का भाव पैदा करना अध्यात्म में प्रवेश का पहला कदम है। प्रकृति जगदम्बा है माँ भगवती है। जमीन में गढ़ी सम्पत्ति सपना हो सकती है, झूठ हो सकती है लेकिन जमीन के ऊपर की प्रकृति हकीकत है, सत्य है, हमारे पास है। अगर हम प्रकृति को खो देंगे तो हमारा पृथ्वी पर अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। प्रकृति सुरक्षित रहेगी तो धर्म रहेगा, धर्म रहेगा तो मानवता रहेगी, मानवता रहेगी तो इंसान खुशहाल रहेगा इसलिए प्रकृति से प्रेम करें। वृक्षारोपण और पालन, नदियों को शुद्ध रखने का प्रयास, प्रदूषण पर अपनी सार्मथ्य के अनुसार नियंत्रण करना प्रकृति से प्रेम है। अन्तः पूजा श्वांस से होती है, श्वांस वृक्ष देते हैं इसलिए प्रकृति प्रेम के बिना पूजा-पाठ व्यर्थ है। 
अगर हरे वृक्ष नष्ट हो जायें तो समस्त प्राणियों पर संकट पैदा हो जाएगा। परमात्मा ने मनुष्य को पृथ्वी पर भेजने से पहले पंच महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश) बनाये। उसके बाद हरे पेड़ों का निर्माण किया फिर पशु-पक्षी इत्यादि बनाये उसके बाद परमात्मा ने मनुष्य को पृथ्वी पर उतारा। 
वृक्ष, नदी, पशु-पक्षी, वायुमण्डल इत्यादि देवता हैं, अर्थात हमें देने वाले हैं। श्री कृष्ण जी श्रीमद् भगवद् गीता में अर्जुन से कहते हैं कि - हे अर्जुन ! तुम देवताओं को उन्नत करो देवता तुम्हें उन्नत करेंगे। तुम वृक्षों, नदियों, पशु-पक्षी, वायुमण्डल इत्यादि की देखभाल करो, ये तुम्हें बदले में बहुत कुछ उपयोगी देंगे। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम एक वृक्ष लगाकर उसे पालना चाहिए। इसीलिए -
2. अन्तः ज्ञान को धारण करना व अन्दर की पूजा करना - 
अन्तः ज्ञान - हम मनुष्यों का शरीर परमात्मा द्वारा बनाया गया 18 द्वारों का परम पवित्र मन्दिर है। इसके 09 द्वार बाहर की ओर तथा 09 द्वार अन्दर की ओर खुलते हैं। बाहर की ओर खुलने वाले 09 द्वारों के विषय में सभी जानते हैं (दो आंख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, मल, मूत्र द्वार) इसी प्रकार 09 द्वार अन्दर की ओर खुलते हैं। बाहर की ओर खुलने वाले द्वारों को काम द्वार कहते हैं इनमें मल है। इन द्वारों से मिलने वाला आनंद एक समय के बाद दुःख का रूप ले लेता है। जैसे हमें छींक आ रही है तो पहले तो अच्छा लगेगा परन्तु एक साथ अगर सौ छींक आ जाये तो दुःख पैदा होगा।
जबकि अन्दर की ओर खुलने वाले द्वारों को राम द्वार कहते ये निर्मल हैं। इन द्वारों से मिलने वाला आनंद धीरे-धीरे परमानंद का रूप ले लेता है। अन्दर के इन द्वारों की यात्रा को ही अन्तः यात्रा, सच्ची यात्रा, परम पवित्र यात्रा कहा गया। जब हम इस अन्तः यात्रा को करते हुये आगे बढ़ते हैं तो हमें सात नगर, चैदह भवन, इक्तालिस गुफाओं के दर्शन होते हैं। जब हम अन्तः यात्रा करते हुये बारवें द्वार पर पहुंचते हैं तो हमें वास्तविक त्रिवेणी के दर्शन होते हैं। जहां इंग्ला(गंगा), पिंगला(यमुना), सुषुम्ना(सरस्वती) का संगम हैं। 
जिस प्रकार किसी भी यात्रा को करने के लिये एक मार्गदर्शक (अर्थात् जिसने उस यात्रा को कर रखा हो) की आवश्यकता होती है उसी प्रकार इस अन्तः यात्रा के मार्गदर्शक को पूर्ण महापुरूष कहते हैं। पूर्ण महापुरूष जब हमें परमात्मा के सच्चे नाम से परिचय कराते हैं तो हम इस यात्रा को करने के योग्य होते हैं। 
बारवें द्वार तक तो कोई भी हठ योग से पहुंच सकता है परन्तु इसके आगे की यात्रा के लिये हमें पूर्ण महापुरूष की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि केवल पूर्ण महापुरूष ही वह व्यक्ति है जो हमें परमात्मा तक पहुंचाने वाली उस परम पवित्र यात्रा को करवा सकता है। वहां तक पहुंचा सकता है जहां हर पल हर क्षण परमात्मा की महाआरती हो रही है, बिना तपन के बिना धुंऐ के निरन्तर उसकी ज्योति जल रही है, जहां नौ तरह का संगीत बज रहा है, नौ तरह की सुंगध से उस अकाल पुरूष का भवन सुगंधित है। हमें बस उस महाआरती में शामिल होना है 
जो महापुरूष वहां तक पहुंचे वे निहाल हो गये। उन्हीं के मुख से वाणियां निकली-

                                          ना वहां सूरज, ना वहां चंदा, आठों पहर उजाला है, सद्गुरू का देश निराला है।

                                          ना वहां ढोलक, ना वहां बाजे, अनहद नाद निराला है, सद्गुरू का देश निराला है।


यह अन्तः यात्रा श्वासों के माध्यम से होती है। हमारी श्वांस में ही परमात्मा का सच्चा नाम विराजमान है। इसीलिये महापुरूषों ने कहा भी है कि:-

                                                             श्वांस-श्वांस में नाम भज, श्वांस न विरथा खोय।

                                                                 न जाने किस श्वांस का आवन होये न होये।।

हमारी श्वांस के दो काम हैं अन्दर जाना और बाहर आना। परमात्मा का नाम भी दो अक्षरों का परम पवित्र नाम है। सच्चे नाम का पहला अक्षर श्वांस के साथ अन्दर जाता है और वायुमण्डल से औषधी ले जाता है और दूसरा अक्षर शरीर का विषतत्व बाहर लेकर आता है। सच्चे नाम के पहले अक्षर को सभी महापुरूषों ने खोल दिया। परमात्मा के सच्चे नाम का पहला अक्षर है ऊँ परन्तु दूसरे अक्षर की जानकारी हमें पूर्ण महापुरूष की शरण में जाकर ही मिलती है। इसीलिये परमात्मा के नाम के दूसरे अक्षर को कहा गया गुरू प्रसाद अर्थात् जब हम जाति-भेद व नशे का त्याग करके सच्चे मन से पूर्ण महापुरूष की शरण में जाते हैं तो पूर्ण महापुरूष सच्चे के नाम के दूसरे अक्षर का परिचय कराते हैं। सच्चे नाम के परिचय की इसी प्रक्रिया को दीक्षा कहते हैं। इसके बाद पूर्ण महापुरूष द्वारा अन्तः पूजा सिखाई जाती है जिसके द्वारा हम उस अन्तः यात्रा को करने की तरफ बढ़ते हैं।
अन्तः पूजा - (30 मिनट की ऐसी उपासना करना जिसका 15 दिन से मन, बुद्धि, शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ना शुरु हो जाता है तथा हम अन्तः यात्रा करने की तरफ बढ़ते हैं।) 
बअन्तः पूजा कम से कम 30 मिनट की होती है। हमें अपनी दिनचर्या की शुरुआत अन्तः पूजा से ही करनी चाहिए। अन्तः पूजा के बाद ही अपने अन्य कार्यो की शुरुआत करें। हमारे द्वारा दिन भर किये गये कार्यो का फल तो कई लोगों में बंट जाता है लेकिन अन्तः पूजा का फल केवल हमें (स्वयं) ही मिलता है। अन्तः पूजा श्वांसों में भिन्न-भिन्न तरीकों से किया गया अजपा जाप है। भिन्न-भिन्न तरीकों से श्वांसों में स्पंदन करने से हम परमात्मा की तरफ बढ़ते हैं। अन्तः पूजा का मुख्य खण्ड है -
सुमिरन - इसमें सच्चे नाम के दोनों अक्षरों को सामान्य गति से नाक के आगे महसूस किया जाता है। शरीर को हिलायें-डुलायें नहीं, जड़ कर दें। सुमिरन के दो खण्ड हैं दीर्घ जाप और सामान्य जाप। पहले दीर्घ जाप करें लम्बा गहरा, सच्चे नाम के अक्षरों पर ध्यान, कोशिश करें कि खुद की श्वांस की आवाज खुद को भी ना आये। पहले सच्चे नाम के अक्षरों को लम्बा गहरा लें सच्चे नाम का पहला अक्षर गहरा लें दूसरा अक्षर गहरा छोड़े और ध्यान दें कि दूसरा अक्षर पहले की अपेक्षा ज्यादा लम्बा व गहरा आ रहा है। इसके बाद जब थक जाएं तो सामान्य जाप करें इसमें सच्चे नाम के दोनों अक्षरों का केवल अनुभव करें अपनी तरफ से लम्बा या छोटा ना करें जैसे अक्षर स्वतः चल रहे हैं केवल अनुभव करें। सुमिरन जितना शुद्ध और गहरा होगा उतनी ही गहराई से हम अन्तः यात्रा में चल पड़ेंगे। सुमिरन का गहराई पूर्वक होना जरुरी है। विचारों का समूह इसमें बाधा डालता है। विचारों की उपेक्षा की कोशिश करते हुये जब हम गहराई से सुमिरन करते हैं तो हम अनहद की धुनकारों की तरफ धीरे-धीरे बढ़ना शुरु करते हैं। 
'सुमिरन में दो अक्षर का सच्चा नाम ही शब्द ब्रहम है।' इन दो अक्षरों पर पूरी तरह ध्यान देना ही सुमिरन है। सुमिरन में कोई भी कल्पना नहीं करनी चाहिए जैसे - मूर्ति, फोटो, गुरु इत्यादि।
सुमिरन भोजन के एक घण्टे बाद भी किया जा सकता है लेकिन सबसे अच्छा समय प्रातः काल सूर्य उदय से पहले का होता है। प्रातः काल प्रकृति अन्तः पूजा में हमारी बहुत मदद करती है। सुमिरन से ही सतलोक की सीमा को पार करके अकाल पुरुष की सीमा में प्रवेश करते हैं। पूर्ण महापुरूष ही सुमिरन के शुद्ध रुप को सिखा सकता है, करा सकता है क्योंकि पूर्ण महापुरूष ही अन्तः जगत का गाइड है। बिना गाइड के अन्तः जगत की यात्रा नहीं की जा सकती। अध्यात्म में प्रवेश का दूसरा कदम है कि हम अन्दर की पूजा (अन्तःपूजा) करें। 
गुंजन - सुमिरन के बाद दूसरा खण्ड है गुंजन। इसमें पूर्ण महापुरूष के चेहरे का तीन बार, चरणों का तीन बार व शरीर का तीन बार ध्यान करते हुए "पूर्णम् शरणम् गच्छाामि" का गुंजन करते हैं।

                                                     पूर्णम् शरणम् गच्छाामि - तीन बार - चेहरे का ध्यान करते हुये

                                                     पूर्णम् शरणम् गच्छाामि - तीन बार - चरणों का ध्यान करते हुये

                                                     पूर्णम् शरणम् गच्छाामि - तीन बार - पूरे शरीर का ध्यान करते हुये

3. पंचदेवों व असहायों की सेवा करना - 
हम पंचदेवों (विधार्थी, मजदूर, किसान, कर्मचारी व व्यापारी) एवं असहायों (विकलांग, बच्चे, वृद्ध) की सेवा करें। पंचदेवों व असहायों की सेवा करने से परमात्मा खुश होता है। जहाँ पंचदेव एवं असहाय खुशहाल हैं वहां की व्यवस्था देश हित की व्यवस्था मानी जाती है। देश का हितैषी या देश-प्रेमी वह है जो देश में पंचदेवों व असहायों की खुशहाली के प्रति जागरुकता पैदा करता है।

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