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Paramdham|Janeu Kranti

आज दिनांक 09 अप्रैल दिन रविवार को श्री परमधाम में त्रिवेणी दर्शन (एकजुटता महायज्ञ) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत राष्ट्रगान से की गयी। इसके बाद क्रंातिकारियों की महाआरती की गयी। इस अवसर पर क्रंातिगुरू श्री चन्द्रमोहन जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि केवल पूजा पाठ ही धर्म नहीं है जब तक मानवता का भाव मनुष्य के अन्दर नहीं है तक तक वह मनुष्य धार्मिक नहीं कहलाता। मानवता स्थापित करने के लिये जाति-व्यवस्था को समाप्त करना होगा। जाति-व्यवस्था को समाप्त करने पर ही मनुष्य धार्मिक बनेगा। समय-समय पर क्रंातिकारियों ने मानवता की स्थापना में अपना योगदान दिया सबसे पहले क्रंातिकारी त्रेता में रामचन्द्र जी महाराज, द्वापर में श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज, फिर महात्मा बुद्ध, गुरू गोबिन्द सिंह जी, सन्त कबीर, सन्त रविदास इत्यादि। उन्होंने अपनी सुख सुविधाओं का त्याग करके और घोर कष्टों को सहकर मानवता की स्थापना की। फिर क्रंातिकारियों जैसे चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सूर्यसेन, बिरसा मुंडा, अल्लूरी सीताराम राजू इत्यादि ने घोर यातनाओं व कष्टों को सहते हुये देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त किया और स्वराज की स्थापना की। वास्तव में क्रंातिकारी भी राम, कृष्ण, बुद्ध इत्यादि के समान ही है। राम, कृष्ण, बुद्ध हो या क्रंातिकारी सभी का मुख्य लक्ष्य था मानवता व एकजुटता की स्थापना करना। इसीलिये श्री परमधाम का मानना क्रंातिकारी हमारे वास्तविक माता-पिता हैं। इनकी उपेक्षा करके किया गया कोई भी पूजा-पाठ-दान-तीर्थ-व्रत इत्यादि परमात्मा स्वीकार नहीं करता। उन्हांेने महावीर जयंती के अवसर पर ‘अंहिसा परमो धर्म’ का अर्थ बताते हुये कहा कि अंहिसा से पहले हमें ये जानना जरूरी है कि हिंसा क्या है ? जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का शोषण करता है तो ये परम हिंसा है इसके बराबर कोई हिंसा नहीं है और यह जाति व्यवस्था मनुष्य का मनुष्य से हर जगह शोषण करवाती है। जब तक जाति-व्यवस्था रहेगी तब तक मनुष्य का मनुष्य पर शोषण बन्द नहीं होगा। अहिंसा को अपनाने का मतलब है कि जाति व्यवस्था के प्रति अपने अन्दर घृणा पैदा करना। ‘जनेऊँ क्रंाति’ के सूत्रों को अपनाकर ही हम जाति व्यवस्था का नाश कर हिन्दुस्तानियों को एकजुट कर सकते हैं। उन्होंने आगे त्रिवेणी की चर्चा करते हुये कहा कि अब तक हम केवल उसी त्रिवेणी के विषय में जानते हैं जो प्रयाग इलाहाबाद में स्थित है जहां गंगा, यमुना व गुप्त रूप में सरस्वती का संगम है। परन्तु वास्त्व में त्रिवेणी तीन हैं। पहली त्रिवेणी तो प्रयाग में है, दूसरी त्रिवेणी श्री परमधाम अरिहन्तपुरम मेरठ में होती जहां हम पूर्णगुरू, संगत और प्रसाद तीनों के दर्शन करते हैं। यहां पूर्णगुरू सरस्वती रूप है, संगत गंगा है और प्रसाद यमुना। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण त्रिवेणी हमारे शरीर के अन्दर है जिसे वास्तविक प्रयाग कहा गया जहां इंगला(गंगा), पिंगला(यमुना) और गुप्त नाड़ी सुषुम्ना(सरस्वती) का संगम है। तीसरी और अति महत्वपूर्ण त्रिवेणी के लिये ही सन्तों ने कहा कि यहां पर डुबकी लगाने पर कौआ भी हंस(पवित्र) बन जाता है। इस अवसर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, दिल्ली, हरियाणा इत्यादि क्षेत्रों से हजारों की संख्या में युवाओं ने भाग लिया।